Tuesday, 4 December 2012

अर्श से फर्श का सफर -

प्रिय ब्लॉग दोस्तों ,
                        नमस्कार !

आज अपने चिट्ठे ' Swapnil World of Words  ' के माध्यम से मैं, अपने द्वारा रचित व लिखित एक उपन्यास का पहला भाग, आप सभी के साथ बाँट रही हूँ. यह कहानी मेरे लिये अत्यंत खास है ........ ज़िंदगी के संघर्ष , घुटन व दर्द की कहानी है ये ....... एक होनहार अभिनेता के अर्श से फर्श तक के सफर की झकझोर कर रख देने वाली दास्तां है ये .....जिसका प्रारंभिक भाग आप सभी के समक्ष इस उम्मीद के साथ प्रस्तुत कर रही हूँ कि आप सभी की बेबाक टिप्पणियाँ व सलाहों द्वारा मुझे इसे और अधिक बेहतर व रोचक बनाने की प्रेरणा मिलेगी.......

ध्यान दीजियेगा कि प्रस्तुत अंश  उपन्यास का केवल प्रारंभिक भाग ही है ...... अभी इसके अन्य भाग लिखने शेष हैं...........इस दिशा में कार्य प्रगति पर है. कोशिश रहेगी कि संपूर्ण उपन्यास शीघ्र ही प्रकाशित होकर विभिन्न पुस्तक भंडारों की शोभा बढा़ये . आप सभी के विचारों , सलाहों व टिप्पणियों का स्वागत है. आपके मार्गदर्शन की आशा के साथ पेश है अर्श से फर्श के सफर का प्रारंभिक भाग :

अर्श से फर्श का सफर :


माया नगरी मुंबई .......सपनों का शहर ........जहाँ हर रोज़ न जाने कितने ही मुसाफिर आते हैं ...... इस शहर में अपनी राह खोजने .............भटकते कदमों की दिशा तलाशने. जिसमे से न जाने कितनों का सपना होता है फिल्म इंड्स्ट्री की चकाचौंध से भरी दुनिया में अपना नाम बनाने का ......... पर् 'अनिरुद्ध खंडेलवाल' को ये सब विरासत में मिला था. अपनी विरासत को आगे बढ़ाते हुए आखिरकार अनिरुद्ध् भी फिल्म इंड्स्ट्री का चमकता सितारा बन गया था. पर देखते ही देखते ये सितारा कहाँ गुम हो गया , इसके बारे में कोई जान न सका. अनिरुद्ध का अर्श से फर्श तक का सफर बेहद दर्दनाक, घुटनपूर्ण , कश्मकश , भ्रम, सच, झूठ , विश्वास, धोखे, बेबसी से भरा हुआ था.

मुंबई के अंधेरी में स्थित बड़े-बड़े बंगलों में से एक बंगला 'अनिरुद्ध' का भी था. अनिरुद्ध ,साइक्लॉजी में स्नातक की डिग्री प्राप्त एक 20 वर्षीय खूबसूरत व बेहद मासूम युवक था. अनिरुद्ध के छोटे भाई 'आकाश'  (18 वर्ष ) की निगाहों में अपने भाई अनिरुद्ध के लिये न कोई इज्ज़त थी न दिल में कोई स्नेह था. अनिरुद्ध के पिता 'तरुण खंडेलवाल' फिल्म इंड्स्ट्री के जाने माने प्रड्यूसर - डायरेक्टर थे जिनके रौब का लोहा पूरी फिल्म इंडस्ट्री मानती थी.

तरुण अपने पुत्र अनिरुद्ध को बेहद नापसंद करते थे और छोटे पुत्र आकाश के प्रति उनका विशेष स्नेह था. अनिरुद्ध को बचपन से ही न माँ का प्रेम मिला ना पिता का . अनिरुद्ध की माँ का देहांत तो उसके छोटे भाई आकाश के जन्म के बाद ही हो गया था.

अनिरुद्ध को अक्सर लगता था कि वो अपने सफल प्रडयूसर पिता की नज़रों में काबिल नहीं है और जिस दिन उसने अपनी काबिलीयत का परचम लहरा दिया , उसी दिन उसे अपने पिता का प्रेम व मान -सम्मान प्राप्त हो जाएगा.

अनिरुद्ध की ज़िंदगी के बीस वर्ष बेहद घुटन भरे थे ..... तरुण से उसे कभी पिता का प्रेम नहीं मिला , मिली तो सिर्फ ज़िल्लत.....न उसका कोई दोस्त था, न साथी, न हमसफर , न सुख-दुख बाँटने वाला कोई शुभचिंतक.  अनिरुद्ध बेहद अकेला था.  एक दिन अनिरुद्ध ने बड़ी हिम्मत कर अपने पिता से उनकी आने वाली फिल्म में एक छोटे से रोल की सिफारिश की , उसे फिल्म इंड्स्ट्री से बेहद लगाव था. पर अनिरुद्ध के फिल्म इंड्स्ट्री में रुचि के बारे में सुनते ही उसके पिता तरुण आग उगलने लगे. उन्होंने अनिरुद्ध का मज़ाक उड़ाया , उससे अपशब्द कहे , उसकी काबिलीयत पर प्रश्नचिन्ह लगाये. और बड़ी ही अभद्रता से कहा कि, " मैं क्या पूरी फिल्म इंड्स्ट्री में तुझे कोई छोटा सा रोल क्या चपरासी का काम भी नहीं देगा....ज़िंदगी भर मेरी गुलामत करनी पड़ेगी... और मुझसे  भीख माँगनी पड़ेगी... अपनी शक्ल देख आईने में... भद्दा, अभद्र , बद्सूरत , मनहूस कहीं का."

अनिरुद्ध के दिल व दिमाग में अपने ही पिता के शब्द ऐसे  जहरीले तीरों की भाँति चुभे कि उसका सारा आत्मविश्वास ही हिल गया. उसका मनोबल इतना टूट गया कि अपने पिता की बात को सच समझ वो चुपचाप वहाँ से चला गया .  अनिरुद्ध को अपने आप से घुटन हो रही थी . अपनी ही शक्ल से उसे घृ्णा हो रही थी. अपने कमरे में उसे बार बार अपने पिता की वो कड़्वी बातें दिमाग में चुभ रहीं थीं...... उसे इतना दवाब मह्सूस हो रहा था मानो कमरे की सारी दिवारें उसके करीब आ रही हैं ......अनिरुद्ध की मानसिक स्थिति खराब होती जा रही थी . इतने बड़े बंगले में अनिरुद्ध के लिये ऐसा कोई कोना ना था जहाँ उसे पल भर की शांति मिले. अनिरुद्ध खुद को इतन विवश महसूस कर रहा था कि स्वयं को छति पहुँचाने, मर जाने की उसकी इच्छा प्रबल होती जा रही थी ...पर उसे पता था कि ये गलत होगा ..... इसलिये वो अपने बंगले से बाहर समुद्र के किनारे एकांत में चला गया.

रात का समय था ....वहाँ अनिरुद्ध ने कुछ दूर पर एक शख्स को देखा . वह युवक अनिरुद्ध की ही उम्र का था. बेहद आकर्षक व्यक्तित्ब , घुंघराले बाल, कटीली आँखे, नील वर्ण . मानो सम्मोहन शक्ति से लैस बेहद उमदा व्यक्तित्व का स्वामी था वह युवक. ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह कुछ ढूंढ़ रहा हो. अनिरुद्ध उसकी मदद करने हेतु उसके पास पहुँचा . अनिरुद्ध के पूछने पर कि क्या वो उसकी मदद कर सकता है .....इस पर युवक ने उत्तर दिया कि, "भाई! जो मैं ढूंढ़ रहा हूँ , वो मैं ही ढूंढ सकता हूँ....."     अनिरुद्ध ने युवक से पूछा आप ऐसा क्या ढूँढ़ रहे हैं ?....... युवक ने उतर दिया कि ," खुद को.."
अनिरुद्ध एक मिनट स्तब्ध रह गया ....... युवक ने तभी जोर से ठहाका लगाया और कहा," अरे जनाब ! खुद का मतलब हीरा....  मैं जौहरी हूँ और मेरा नाम हीरा है ...  और देखिये जरा मेरे पास हीरों की एक पोटली थी और जाने कहाँ मुझसे गुम हो गई .... मुझे लगता है वो यही कहीं गिरी है मुझसे ...बस वही ढूँढ़ रहा हूँ."

अनिरुद्ध हँसने लगा और कहा ," यहाँ !! अगर आपकी पोटली गिरी भी होगी तो हीरे जैसी चीज़ कोई छोड़ेगा भला. ..कोई ले गया होगा ..... या समुद्र की लहरों के साथ बह गए होंगे आपके हीरे..."
युवक ने कहा कि ," लो मेरा तो लाखों का नुकसान हो गया ....लेकिन चलो कहा जाता है कि इस अनंत समुद्र के भीतर खूब खजाना है...उस खजाने की बढोत्तरी में मेरा भी contribution हो गया."

अनिरुद्ध ने मन में सोचा कि कैसा अजीब आदमी है ...इतने नुकसान पर भी हँस रह है .......पागल ही लगता है . तभी युवक ने कहा, "आप सोच रहे होंगे कि मैं पागल हूँ पर यही ज़िंदगी है.  देखिये आज ही पिताजी ने ये ज़िम्मेदारी मेरे कंधों पर डाली थी........लेकिन मैं उसमे असफल रहा ...... अब असफल तो रहा और गलती भी मेरी है ....... जिसकी भरपाई मैं तब तक नहीं कर सकता जब तक ये गलती सुधर न जाए .....फिलहाल इस गलती के सुधरने के आसार तो लगते नहीं , तो क्या करुँ आगे बढूँ या यहीं थम जाऊँ ......मैं तो आगे बढ़ने में विश्वास रखता हूँ ........गलती फिर ना हो जाए या नुकसान न हो इस डर से जीना तो नहीं छोड़ सकता ना........ आपकी क्या राय है .......वैसे आप ने अपना नाम नहीं बताया ." युवक ने पूछा.

अनिरुद्ध ने उत्तर दिया ...... उस युवक से घंटों अनिरुद्ध बात करता रहा.  युवक की आशावादी बातों को सुन  अनिरुद्ध का मन हल्का हुआ और उसका खोया आत्मविश्वास वापस आ गया था.  अनिरुद्ध ने फैसला लिया कि वो स्वयं को एक मौका जरुर देगा. और स्व्यं अपने बल पर अपने पिता की पहचान गोपनीय रखते हुए फिल्म इंड्स्ट्री में अपना नाम बनाएगा. अगले ही दिन से अनिरुद्ध फिल्मों के लिये आडिशन्स देने लगा..... कई आडिशन्स देने के बाद आखिरकार अनिरुद्ध को एक बड़े बैनर की फिल्म मिल गई.  कहते हैं न कि व्यक्ति में काबिलीयत और हौसला हो तो उसे सफल होने से कोई नहीं रोक सकता. अनिरुद्ध के साथ भी ऐसा ही हुआ . फिल्म बन के तैयार हुई . इत्तेफाक से रिलीस डेट वही रखी गई जिस दिन उसके पिता की फिल्म रिलीस होनी थी. अनिरुद्ध की फिल्म ने box office पर कमाल किया. जनता को एक नया हीरो मिला और अनिरुद्ध रातों रात सुपर स्टार बन गया ......एक दम सपने जैसा लग रहा था सब कुछ . इसके उलट तरुण ,अनिरुद्ध के पिता जिनके लिये उनकी फिल्म उनका ड्रीम प्रॉजेक्ट थी बुरी तरह विफल रही ,जिससे वो दिवालिया होने की कगार में आ गए . पिता का सफर अब अर्श से फर्श पर आ पहुँचा तो बेटा अब किसी का मोहताज नहीं रह गया . स्थिति बदल चुकी थी ....... सब कुछ देखते- देखते ही बदल गया था .

अनिरुद्ध  तेजी से अन्य फिल्मों में अभिनय कर अपनी सफलता का परचम लहरा रहा था तो वहीं उसके पिता अपने ही बड़े पुत्र के मोहताज होने लगे थे जो उन्हें कतई गवारा न था . पर अनिरुद्ध को उसके हिस्से की इज्जत, मान सम्मान देना अब उनकी मजबूरी बन गई थी. आखिरकार तरुण ने एक दिन अनिरुद्ध को गले लगा ही लिया और अपनी गलती की माफी माँगी.

अनिरुद्ध की ज़िंदगी हर दिन खुशियाँ लेकर आ रही थी. पर वो अपनी ज़मीनी हक्कीकत को कभी नहीं भूला......सफलता के सातवें आसमां पर पहुँचने के बाद भी वो जमीं पर चलना नहीं भूला.

वक्त बीतता गया. अनिरुद्ध ने अपने पिता के लिये भी कई फिल्में करीं...... अब तरुण की स्थिति भी कुछ हद तक सुधरने लगी थी. पर ये भी सच था कि अनिरुद्ध के बिना तरुण खंडेलवाल कुछ भी नहीं थे. अनिरुद्ध का छोटा भाई आकाश भी अब फिल्म इंड्स्ट्री में आ चुका था. पर अनिरुद्ध की चमक के आगे सब फीके ही थे . तरुण खंडेलवाल अनिरुद्ध पर अपना दबाव बनाना चाहता था. पर अपने ही पुत्र से उसकी ईर्ष्या का स्तर इतना अधिक था कि वो उससे हर हाल में छुट्कारा भी पाना चाहता था. तरुण खंडेलवाल को अनिरुद्ध की सफलता में अपनी हर पल हार नज़र आती थी. वो पूर्णयता एक विकृ्त मानसिकता का व्यक्ति बन गया था.

अपनी विकृ्त मानसिकता के चलते उसने अनिरुद्ध की शादी करने का फैसला किया. वो भी शादी उस लड़की से जिससे खुद तरुण के नाजायज़ संबंध थे. ताकि उसकी मदद से वो अनिरुद्ध की ज़िंदगी बरबाद कर सके. अनिरुद्ध इन बातों से अन्जान था. अपने पिता की इच्छा का मान रखते हुए अनिरुद्ध ने शादी के लिये हाँ कर दी. पर उसी वक्त से अनिरुद्ध की ज़िंदगी में बेहद आश्चर्यजनक बदलाव शुरु हो गए.

एक रात अनिरुद्ध को अपने कमरे में  कुछ अजीब सी आवाज़ें सुनाई दीं. बेहद अजीब सी आवाज़ें थी. अनिरुद्ध ने उठ कर इधर -उधर देखा .........पर वहाँ कोई ना था. आवाज़ों की ध्वनि बढ़ती जा रही थी ....... न वो आवाज़ें जानवर की थीं ....... ना ही किसी इंसान की ........बस दिमाग थकाने वाली आवाज़ें थीं. किसी तरह वो रात कटी. अगले दिन आउट्डोर शूटिंग के दौरान भी अनिरुद्ध को पुन: वो आवाज़ें सुनाई दे रही थीं ......जैसे उसके दिमाग में वो आवाज़ें बस सी गई हों. ये बेहद विचलित कर देने वाला अहसास था . अनिरुद्ध समझ नहीं पा रहा था कि ये सब उसके साथ क्या हो रहा है. अनिरुद्ध अपना पूरा दिमाग अपने काम पर लगाना चाहता था . एक दिन अनिरुद्ध अपनी एक फिल्म के प्रमोशन के सिलसिले में अपने फैन्स से मुखातिब हो रहा था. तभी भीड़ में उसे एक शख्स दिखा. वो बड़ा ही अजीब सा दिख रहा था......कुछ अलग सा.... अनिरुद्ध का ध्यान जैसे ही उस पर गया वह झट से अनिरुद्ध के पास आ गया मानो कोई हवा हो .....जहाँ अनिरुद्ध के फैन्स अनिरुद्ध के साथ एक फोटो व उसे छूने के लिये बेकरार थे वहीं वह शख्स अनिरुद्ध को देख बड़े ही रहस्यमयी तरीके से हँसने लगा .....जैसे वो उसका मज़ाक उड़ा रहा हो .......अनिरुद्ध उस शख्स को ध्यान से देख रहा था, देखते ही देखते उस शख्स की हँसी गायब होती चली गई और चेहरा बेहद विकृ्त होता चला गया.... और वो जोर -जोर से चीखने लगा,"भाग जाओ , भाग जाओ ".  अनिरुद्ध उसका ये भयानक रुप देख घबराकर वहां से भाग पड़ा. अनिरुद्ध के फैन्स व वहाँ उपस्थित अन्य लोग अनिरुद्ध का ऐसा रवैया देख अचंभित रह गए. अनिरुद्ध घबराकर अपने घर लौट आया. अगले दिन जब अनिरुद्ध शूटिंग पर पहुँचा तो वहाँ लोगों ने उससे इस विषय में पूछा कि कल अनिरुद्ध वहाँ से अचानक क्यों भागा था? जब अनिरुद्ध ने लोगों से उस शख्स की चर्चा करी तब सभी अनिरुद्ध को बड़े ही आश्चर्य से देखने लगे. अनिरुद्ध के पूछने पर कि आप सब मुझे ऐसे क्यों देख रहे हैं ? तब अनिरुद्ध के एक करीबी ने साफ तौर पर बताया कि जनाब ! वहाँ पर तो ऐसा कोई शख्स था ही नहीं, जिसकी आप चर्चा कर रहे हैं.
यह सब सुन अनिरुद्ध अचंभित था . पहले तो उसे उन लोगों की बातों पर यकीन नहीं हुआ. पर बाद में एक न्यूज़ चैनल पर उसने इस वाक्ये के फुटेज देखे तब अनिरुद्ध को समझ आया कि ये सब तो असल में उसकी ही आँखों का धोखा था. दिनों दिन अनिरुद्ध की मानसिक स्थिति बिगड़ती जा रही थी. रातों को नींद नहीं आती और दिन में वो आवाज़ें  अनिरुद्ध का पीछा नहीं छोड़तीं . चूंकि अनिरुद्ध खुद psychology में स्नातक था, इसलिये उसे यह समझने में देर नहीं लगी कि उसकी दिमागी हालत सही नहीं . असल में अनिरुद्ध को Schizophrenia था .

पर ज़िंदगी के उस मकाम पर जहाँ उसने वो सब कुछ पा लिया था जिसका अनिरुद्ध ने सपना देखा था ,फिर इस बिमारी की वजह क्या थी ....यह अनिरुद्ध के समझ  के परे था.  और Schizophrenia जैसी बिमारी उसके कैरियर को , उसकी ज़िंदगी को अंधकार की ओर ले जाएगी , यह भी लगभग तय था. और अपने इसी भय के कारण अनिरुद्ध ने इस बात का जिक्र सबसे पहले अपने पिता से किया क्योंकि अनिरुद्ध को अपने पिता पर पूर्ण विश्वास था.

जैसे ही तरुण को इस बात क पता चला , उसने अनिरुद्ध को मुंबई से दूर नैनिताल में अपने करीबी दोस्त जो कि एक साइकोलॉजिस्ट थे , 'डॉ . श्याम सक्सेना' के पास इलाज के लिये भेज दिया. नैनिताल में अनिरुद्ध की बिमारी की बात छिपाते हुए तरुण ने चट मंगनी पट ब्याह करवा दिया. अनिरुद्ध उस वक्त इतना परेशान था कि जैसा तरुण उससे कहता गया , वैसा अनिरुद्ध करता गया .पर अनिरुद्ध की हालत नैनिताल में भी बिगड़ती जा रही थी. उसका इलाज पूर्णतया गुप्त तरीकों द्वारा किया जा रहा था, जिसका जिम्मा तरुण और अनिरुद्ध की पत्नी व तरुण की mistress 'पल्लवी' ने उठा रखा था. धीरे - धीरे अनिरुद्ध की हालत गंभीर होती चली गई. यहाँ तक की अब उसे shock treatments भी दिये जाने लगे. अनिरुद्ध की स्थिति बद से बदतर होती जा रही थी.

करीब एक साल् बीत चुका था. अनिरुद् अपना यौवन , खूबसूरती व चमक सब खो चुका था. अब अनिरुद्ध की स्थिति काफी दयनीय थी. वह अपना सब कुछ खो चुका था. अनिरुद्ध की पत्नी पल्लवी ने पहले ही उसे पागल करार कर उससे तलाक ले लिया था. पल्लवी ने अनिरुद्ध पर धोखे से शादी करने व अन्य कई केस लगाकर बदले में क्षतिपूर्ति के लिये करोड़ों रुपये ऎंठे. उधर मुंबई में एक साल् तक अनिरुद्ध की बिमारी को पागलपन बता कर मीडिया ब्रेकिंग न्यूज़ के नाम पर अनिरुद्ध का तमाशा बनाती रही. बड़े - बडे लेखकों ने अनिरुद्ध के अर्श से फर्श तक के इस सफर पर ढेरों किताबें लिख डालीं. अनिरुद्ध के दर्दनाक जीवन पर फिल्में बनीं और जिसका सीधा फायदा हुआ तरुण खंडेलवाल को .....क्योंकि अनिरुद्ध की दिमागी हालत खराब होने की खबर को आम जनता के सामने परोसा भी तो उसी ने था. उसने अपने ही बेटे की तकलीफ का तमाशा बनाकर खूब रुपया कमाया. असल में ये सब तरुण की ही सोची समझी रणनीति थी जिसकी नींव उसी दिन से रख दी गई थी जब अनिरुद्ध ने अपनी बिमारी क जिक्र अपने ही पिता तरुण से किया था. तरुण ने तभी ये षड्यंत्र रच डाला था कि अनिरुद्ध की बिमारी के चुपचाप इलाज के नाम पर उसे नैनिताल ले जाएंगे ....वहाँ गुपचुप तरीके से एक चरित्र हीन लड़की से अनिरुद्ध की शादी करवा कर उसका गलत इलाज कराएंगे वो भी तब तक, जब तक अनिरुद्ध पूरी तरह से शारीरिक और मानसिक स्तर पर टूट नहीं जाए. और हुआ भी ऐसा ही. अनिरुद्ध की ज़िंदगी बरबाद कर उसे सड़क पर छोड़ दिया गया ......

अब अनिरुद्ध की वो हालत थी कि सड़क चलते लोग उसे नहीं पहचान पा रहे थे . अनिरुद्ध के आत्मविश्वास की धज्जियाँ उड़ गई थी. पर फिर भी वह नहीं समझ पा रहा था कि असल में उसकी बरबादी की वजह क्या है . वह हर पल अपनी बिमारी को ही अपनी बरबादी की वजह समझ कर भट्क रहा था. अपनों के ही विश्वासघात की कहानी अभी उसके सामने आई ही नहीं थी . वह समझ नहीं पा रहा था कि उसके साथ क्या हुआ और कैसे देखते - देखते वो चंद आवाज़ें व भ्रम ने उसकी शानदार ज़िंदगी को अर्श से फर्श पर ला दिया था. अनिरुद्ध नैनिताल की सड़कों पर पागलों की तरह घूमता फिर रहा था. उसकी हालत बेहद खराब थी. धीरे-धीरे भीख माँग कर किसी तरह उसने मुंबई वापस जाने की टिकट की व्यवस्था करी.

खैर , वह दिन भी आखिरकार आ ही गया जब अनिरुद्ध अर्धविक्षिप्त हालत में वापस मुंबई आ गया. मुंबई पहुँचते ही उसने अपने बंगले पर दस्तक दी . दरवाज़ा खुला. बंगला अब महल बन चुका था. पूरे घर की रंगत ही बदल गई थी. एक साल में सब कुछ बदल गया था. सिवाये एक पुराने नौकर के.......जिसने छोटे पर से अनिरुद्ध को देखा था. वो अनिरुद्ध को पहचान गया . अनिरुद्ध की वो हालत देख उस नौकर की आँखो से अश्रु की मानो नदियाँ बहने लगीं हो . अनिरुद्ध भी भाव विभोर हो गया ..... पर अनिरुद्ध को क्या पता था अभी तो ज़िंदगी का वो पन्ना खुलने की कगार पर है जहाँ अनिरुद्ध खुद को खुद से ही खो बैठेगा या यूँ कहें कि अनिरुद्ध के अस्तित्व का अंत उसका बेसब्री से उसका इंतजार कर रहा था . 

अनिरुद्ध के घर के अंदर कदम क्या पड़े ...उस पर तो मानो आसमां टूट पड़ा हो.....सब कुछ बदल गया था.......  सबसे सामने वाली दीवार पर आकाश की दर्जनों फोटो लगी थीं. फोटो देख कर ऐसा लग रहा था कि आकाश ने फिल्म इंड्स्ट्री में काफी नाम कमा लिया है. अनिरुद्ध ने दूसरी दीवार देखी . और उसे भीषण धक्का लगा...क्योंकि वहाँ जो फोटो लगी थी , उसकी तो अनिरुद्ध कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था .....वह फ़ोटो थी अनिरुद्ध के अपने बाप की उसकी नई पत्नी के साथ ... तरुण ने दूसरी शादी कर ली थी वो भी पल्लवी जो कभी अनिरुद्ध की पत्नी थी, उसके साथ . और तीसरी दीवार की ओर जब नज़र पड़ी तब तो अनिरुद्ध के पैरों के नीचे की जमीं ही खिसक गई .........अनिरुद्ध ने अपनी ही फोटो पर हार चढ़ा देखा...... अनिरुद्ध की आँखों के सामने अंधेरा छा गया.........उस वक़्त घर पर नौकर के अलावा कोई और नहीं था...किसी तरह उसने अनिरुद्ध को संभाला...... उसने अनिरुद्ध से कहा ,"बेटा ! तुम यहाँ से तुरंत भाग जाओ... अब ये जगह तुम्हारे लिये सही नहीं ...तुम्हारे पीठ पीछे यहाँ वो सारे काम होते हैं जो मुझे बताते हुए भी शर्म आती है...... तुम्हारी बरबादी के पीछे भी तुम्हारे अपनों का हाथ है.....बल्कि जिन्हें तुम इतने समय से अपना समझ रहे थे ...उनका तो दूर दूर तक तुमसे कोई संबंध ही नहीं है .....इनसे तुम्हारा खून का कोई रिश्ता नहीं......मुझे माफ कर दो बेटा कि मैंने इतने समय से ये बातें तुमसे छिपाई ...मैं डरता था ........कि अगर मैंने तुम्हें सच बताया तो तरुण मेरे बीवी बच्चों को खत्म कर देगा ...पर मुझे नहीं पता था कि इतिहास एक बार फिर दोहरा जाएगा..... मुझे पता था कि तुम मर नहीं सकते . तरुण ने तुम्हें मृ्त घोषित कर दिया है ....... और मुझे मेरे कर्मों की सजा भी मिल गई .......एक दुर्घटना में मेरी बीवी और बच्चे सबकी मौत हो गई ...ये मेरे ही कर्म थे ....मुझे तुम्हें सब  पहले ही बता देना चाहिये था. लेकिन मुझे नहीं पता था कि तरुण तुम्हारे साथ भी वही करेगा जो उसने तुम्हारे माँ- बाप के साथ किया था.... 27 साल पूर्व ..........."

तभी दरवाजे पर दस्तक हुई.... नौकर घबरा गया .....   उसने पीछे के दरवाजे से अनिरुद्ध को भाग जाने को कहा.... और देर रात में उसके घर पर चुपचाप अनिरुद्ध को मिलने को कहा........

रात हो चुकी थी ...अनिरुद्ध समुद्र के किनारे एकांत में बैठा था ...भीड़ भी कम होती जा रही थी ...... तभी समुद्र की लहरों के साथ एक बड़ा सा बेहद खूबसूरत शंख अनिरुद्ध के पास आ गया .....अनिरुद्ध उसकी खूबसूरती हो देख इतना आकर्षित हुआ कि उसे अपने पास रख लिया ......कुछ देर बाद उसे कुछ दूर एक युवक दिखाई दिया ........20-22 वर्ष उम्र होगी उसकी.... अनिरुद्ध की तरफ उसकी पीठ थी ....... ऐसा लग रहा था कि वो युवक कुछ ढूँढ़ रहा था. अनिरुद्ध के सामने कुछ पुरानी यादें ताज़ा हो गईं.....अनिरुद्ध को याद आया वो पल जब ऐसे ही एक युवक से हुई मुलाकात ने अनिरुद्ध का जीवन ही बदल दिया था जो बेहद सकारात्मक बदलाव था.... आज भी अनिरुद्ध को ऐसे ही बदलाव की आवश्यकता थी. इस उम्मीद के साथ अनिरुद्ध उस युवक की ओर बढ़ा......... अनिरुद्ध ने युवक से पूछा कि. "क्या मैं आप की मदद कर सकता हूँ ?".......


युवक ने पलट कर देखा .......उसे देख अनिरुद्ध काँप उठा .........वो हूबहू वही युवक था जो करीब पाँच साल पूर्व अनिरुद्ध को मिला था.......पर ये कैसे मुमकिन था ..इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी कोई बिलकुल न बदले.....ये तो चमत्कार ही था ...... अनिरुद्ध ने उससे कहा,"आप तो हीरा हैं ना"....... उस युवक ने कोई जवाब नहीं दिया ......वो अनिरुद्ध की ओर देख बड़े ही रहस्यमयी तरीकी से मुस्कुरा रहा था. अनिरुद्ध का शरीर काँपने लगा.... अचानक वही आवाज़ें पुन: सुनाई देने लगीं. अनिरुद्ध का सिर दर्द से फटा जा रहा था.... अनिरुद्ध इतना घबरा गया कि उसने उस युवक का हाथ पकड़ लिया. पर उस युवक का हाथ एकदम ठंडा था मानो कोई मृ्त शरीर को छू लिया हो ..... अनिरुद्ध द्वारा उस युवक को छूते ही युवक का शरीर सफेद पड़ता चला गया आँखो से आँसू बहने लगे .. और धीरे-धीरे वह एक धूमिल सी आकृ्ति बन गया .... अनिरुद्ध इससे पहले कुछ समझ पाता आवाज़ें इतनी तेज हो गईं कि अनिरुद्ध ने अपनी आँखे बंद कर ली ...जब वो आवाज़ें अनिरुद्ध के बर्दाशत से बाहर हो गईं तो उसकी चीख निकल पड़ी ....... अनिरुद्ध की उस एक चीख के बाद एक गहरा सन्नाटा छा गया ...बस लहरों की आवाज़ें ही सुनाई दे रही थी..... अनिरुद्ध चाह कर भी अपनी आँखें नहीं खोल पाया और वहीं लेट गया. ............... कुछ समय बाद जब अनिरुद्ध की आँखें खुली ....तो उसने अपने आप को तन्हा  पाया......एक गहरा सन्नाटा था उसके आस पास , समुद्र की लहरों के अलावा कोई अन्य आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थीं ..............अनिरुद्ध को अपनी तबियत पहले से बेहतर लग रही थी.......... वह सब कुछ भुला के अब एक नई शुरुआत करना चाहता था............. पर कहाँ जाए,  किससे मदद माँगे...ये सारे सवाल उसके सामने चुनौती बन कर खड़े हुए थे.....

फिर उसे अपने नौकर की बात याद आई ...कि उसने अनिरुद्ध को देर रात को उसके घर पर मिलने को कहा था.....उसे कुछ अनिरुद्ध को बताना था. अनिरुद्ध को जीवन की नई शुरुआत करने का यही सही रास्ता लगा ......उसे वो सब जानना था जिससे वो अभी तक अंजान था............ अनिरुद्ध ने उस शंख को उठाया जो लहरों के साथ उसके पास आ गया था.. और निकल पड़ा अपने 'मनहर काका' { नौकर } के पास .


'मनहर', मुंबई के एक चाल मे रहता था.... अनिरुद्ध ने दरवाज़े पर दस्तक दी . मनहर ने दरवाजा खोला.... और अनिरुद्ध को अपने गले से लगा लिया......
अनिरुद्ध ने अपने मनहर काका को तसल्ली दी ....मनहर ने खुद को संभालते हुए...... अधिक समय व्यर्थ न करते हुए अनिरुद्ध को उसके जीवन से जुड़ी सच्चाइयों से अवगत कराना प्रारंभ किया .

मनहर ने अनिरुद्ध को बताया कि अनिरुद्ध का असली बाप तरुण नहीं है....... तरुण तो वो आसतीन का साँप है जिसने अपने ही मालिक का बसा बसाया संसार उजाड़ कर रख दिया....
मनहर ने अनिरुद्ध को बताया ,"अंधेरी का जो आलीशान बंगला है ...वो असल में अनिरुद्ध के असली पिता का था.... अनिरुद्ध के पिता एक जाने माने गहनों व हीरों के व्यापारी थे.... और अनिरुद्ध की माँ सविता एक मशहूर अभिनेत्री थीं . जिनकी खूबसूरती की चर्चा हमेशा चरम पर रहती थी...... मनहर ने अनिरुद्ध के हाथों में शंख देख , भाव विभोर होते हुए बोला ,मेमसाब बिल्कुल आपकी तरह थी ..एकदम मासूम सी.......एकदम परी थीं वो ......गरीबों की मसीहा ......उन्हें भी शंखों का बहुत शौक था..... तब के जमाने में अपने परिवारिक विरोध के बावजूद उन्होंने अपने बल पर अपना नाम बनाया था. वे बहुत बहादुर थीं. फिल्म जगत में उनकी बहुत इज्ज़त थी........ तुम्हारे पिता उनके बहुत बड़े फैन थे ....... वो अक्सर तुम्हारी माँ की शूटिंग देखने जाया करते थे ......एक दिन अपने करीबी नौकर 'विनोद' द्वारा तुम्हारे पिता ने सविता मेमसाब को पत्र भिजवा के अपने प्रेम का इज़हार कर दिया......
उस वक़्त तो मेमसाब बहुत नाराज हुईं पर धीरे - धीरे इनका प्यार भी परवान चढ़ा और दोनों ने शादी कर ली. शादी के एक साल बाद तुम्हारा जन्म हुआ......तुम्हारे जन्म से तुम्हारे पिता और माँ बहूत प्रसन्न थे....बहुत सारे सपने देखे थे उन्होंने ...तब मैं भी उनके साथ था .....मैं उस शान का, उन खुशियों का अब एकमात्र गवाह हूँ ........ अभी तुम्हारे जन्म की खुशियाँ भी ठीक से नहीं मना पाए थे हम कि तुम्हारी माँ का चचेरा भाई 'तरुण' आ पहुँचा और सविता मेमसाब के सामने गिड़्गिड़ाने लगा कि उन पर रहम कर दो .........मेमेसाब उन्हें बाहर का रास्ता दिखाना चाह्ती थीं क्योंकि वो अपने परिवार वालों की नीच हरकतों से भली-भाँति परिचित थीं....तरुण के साथ उसकी पत्नी भी थी  .....वो बार - बार गिड़गिड़ा रहा था...पैरों पर लोट रहा था... उसकी स्थिति काफी दयनीय थी.. ऐसे मैं तुम्हारे पिता को तरुण की हालत देख बड़ा दुख हुआ ....... और तुम्हारी माँ के लाख मना करने के बाद भी तुम्हारे पिता ने तरुण को अपने घर पर पनाह दी....तरुण ने कहा कि वो उनका अहसान जीवन भर नहीं भूल पाएगा .....जीवनपर्यंत उनका नौकर बन उनकी सेवा करेगा...... तुम्हारे पिता एक दयालु व्यक्ति थे .... और सविता मेमसाब उनसे बहुत प्रेम करती थीं ...तो मालिक की खुशी में ही उनकी खुशी भी थी...पर उन्हें क्या पता था कि दया कर के असल में वो आसतीन के साँपों को पनाह दे रहे हैं....जो एक दिन उनको ही डसेंगे .... और हुआ भी ऐसा ही .......तरुण ने धीरे - धीरे 1 साल के भीतर मालिक और मेमसाब की बसी बसाई गृ्हस्थी, सपने सब कुछ बरबाद कर दिये.....तुम्हारे पिता के करीबी नौकर विनोद ने तरुण पर मुकदमा करने की बात की  थी पर तरुण ने उसे भी रास्ते से हटा दिया.....सब कुछ तबाह हो गया था......तुम्हारे पिता की मौत की बात सुन , तुम्हारी माँ पागल हो गईं और कुछ दिन बात खबर मिली कि पागलखाने में छत से कूद कर उन्होंने आत्महत्या कर ली थी......सुनने में आता था कि अपने आखिरी समय में वो बस यही कहती रहती थीं कि, "भाग जाओ.....भाग जाओ."..............

तरुण ने अपने गुनाहों को  इतनी सफाई से अंजाम दिया जिसमे उसकी पत्नी ने भी उसका खूब साथ दिया....... कोई भी उनके खिलाफ कुछ नहीं कर पाया और जिसने आवाज़ उठाई भी , उसकी आवाज़ हमेशा के लिये बंद कर दी गई...... तरुण ने तुम्हारे पिता के व्यापार को बेच डाला और सारी संपत्ति अपने अधिकार में कर ली....... साम, दाम ,दंड , भेद का प्रयोग कर तरुण ने अपने रास्ते के हर काँटे को उखाड़ फेका..... सविता मेमसाब के भाई के नाम से फिल्म जगत में अपनी जगह बनाई ..चूँकि तुम्हारी माँ की बहुत इज्जत थी तो उनका भाई होने के नाते उसको भी काम मिलने लगा... और फिर गलत कामों द्वारा उसने तुम्हारे हक को तुमसे छीन उस पर अपना हक कायम कर लिया.....उसने फिल्म जगत में तुम्हारी माँ पर लाँछन भी लगाये और उन्हें भी बदनाम किया . मैं चाह कर भी कुछ ना कर सका ...... मुझे अपने बीवी , बच्चों की फिक्र थी.........पर देखो !! काश मैं आँखें बंद कर ये अत्याचार न देखता तो शायद इतनी ज़िंदगियाँ बरबाद न होतीं...............मुझे माफ कर दो बेटा..!   जब तरुण ने तुम्हारे मृ्त होने की घोषणा की , तब मैं पूरी तरह हिल गया था कि ये मुझसे कैसा पाप हो गया ......जिन मालिक और मेमसाब ने मेरे लिये एक वक़्त इतना कुछ किया उनकी अमानत को भी नहीं संभाल सका..... हर रोज ईश्वर से प्रार्थना करता था कि एक मौका मिल जाए तो अपने सारे पापों का  प्रायश्चित कर लूँ.......... और देखो ईश्वर ने मेरी सुन ली और तुम ज़िंदा हो ......ईश्वर को बहुत बहुत धन्यवाद..............."

अनिरुद्ध ये सब सुन सन्न रह गया था........उसकी आँखो के आँसू तो इतने बड़े विश्वासधात को सुन सूख ही गए थे.............. खोने को कुछ बाकी ना था.....अनिरुद्ध स्वयं बिल्कुल मुर्दा बन गया था.........पर वो टूटा न था...........

मनहर ने अनिरुद्ध को पानी दिया और कहा, "क्या तुम अपने असली माता- पिता की फोटो देखना चाहते हो" .......अनिरुद्ध कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था..... उसने मनहर को हाँ का इशारा किया ....मनहर ने एक बेहद पुराने संदूक को खोला ....उसमें से एक फोटो निकाली ...... फोटो जैसे ही अनिरुद्ध ने देखी उसके हाथ काँप गए .............. फोटो हाथ से छूट गई ...मनहर ने फोटो अपने हाथ में उठाई और कहा ये हैं तुम्हारी माँ , और ये हैं तुम्हारे पिता 'हीरा' जी.........और उनके बगल में 'विनोद' है......

अनिरुद्ध मनहर को देख कर रह गया ................. असल में अनिरुद्ध समझ ही नहीं पा रहा था कि ये आदमी कैसे उसके पिता हो सकते हैं तब जब उसने समुद्र किनारे उन्हें ही देखा है ...उनसे बात की है ...ये कैसे मुमकिन है .........और जिस आदमी को मनहर विनोद बता रहा है वो वही था जो उसे एक बार उसके फैन्स के बीच दिखा था ..जिसे देख  अनिरुद्ध भाग गया था और लोगों ने इसे अनिरुद्ध का भ्रम बताया था......अनिरुद्ध को भी "भाग जाओ, भाग जाओ" कहते हुए किसी की आवाज़ें सुनाई देती थीं .जैसा कि मनहर ने बताया कि अनिरुद्ध की माँ भी अपने आखिरी समय में बस यही कहती रहती थीं......

अनिरुद्ध ने अपनी तक्लीफों का जिक्र कभी मनहर से नहीं किया था...यहाँ तक की तरुण को भी उसने पूरी बात नहीं बताई ...तो जो उसने आज तक एहसास किया था , देखा था वो बातें उसकी पिछली ज़िंदगी का आईना थीं........मनहर की हर बात , मनहर द्वारा दिखाई हर तस्वीर उन लोगों के सच को सामने ला रही थी ... जिनकों अनिरुद्ध ने  पहले ही मह्सूस किया था और जिसे वो भ्रम मान रहा था .. असल में वही उसकी असली ज़िंदगी थी......

अनिरुद्ध समझ गया था कि उसे कोई मानसिक बिमारी नहीं ..... वो  Schizophrenia   का शिकार नहीं अपितु ये तो आभास था ......ये तो उसके अपनों का प्यार था , ये तो वो अप्रत्यक्ष शक्ति थी जो बार - बार उसे सचेत कर रही थी...कि कुछ बहुत गलत है ...... पर अनिरुद्ध ने अपने विश्वास पर विश्वास नहीं किया ......कभी जानने की कोशिश नहीं की वे कौन हैं जो उसे बार - बार दिखाई देते हैं........वे आवाज़े उससे क्या कहना चाहती हैं....... क्या संबंध है अनिरुद्ध का इन सब से ....


पर अब सब कुछ साफ था ...अनिरुद्ध अपना सब कुछ खो चुका था.....इतिहास एक बार फिर  दोहरा चुका था..जो 27 वर्ष पूर्व अनिरुद्ध के माता-पिता के साथ तरुण ने किया वही सब अनिरुद्ध के साथ भी तरुण द्वारा किया जा चुका था................
अनिरुद्ध को अपने पिता के साथ वो पहला अनुभव याद आया जब उन्होंने अनिरुद्ध से कहा था ...कि अगर गलती हो गई तो उसे सुधारा भी जा सकता है .....................अनिरुद्ध ने भी अपनी गलती को सुधारने और अपने माँ- बाप के बेहद दर्दनाक अंत का बदला लेने का फैसला किया ...........

उसने  तरुण के पापों का अंत करने का निर्णय लिया.......... उसने मनहर से कहा कि वो बस इतना कर दे कि किसी तरह अनिरुद्ध की  उसके बंगले में काम करने की व्यवस्था करवा  दे ...... मनहर ने आशंका जताई कि यदि अनिरुद्ध को किसी ने पहचान लिया तो ......
अनिरुद्ध ने मनहर को विश्वास दिलाया कि बचपन से आज तक तरुण ने उसे जब् कभी बेटा समझा ही नहीं तो उसको ध्यान से देखा क्या होगा.. और अब तो उसका यौवन , उसकी सुंदरता सव नष्ट हो चुकी है ....फिर भी अनिरुद्ध वहाँ गूँगा बन कर जाएगा और नौकर बन कर धीरे -धीरे आकाश को हथियार बनाकर तरुण को बरबाद कर डालेगा..........

अनिरुद्ध ने बड़ी ही सफाई से मनहर के पास उपलब्ध सीमित संसाधनों द्वारा अपना हुलिया पूर्णतया बदल डाला ... और वो दिन भी आ गया जब अनिरुद्ध नौकर के काम के लिये मनहर की मदद से तरुण के पास जा पहुँचा.....तरुण ने सबसे पहले तो अनिरुद्ध को देखते ही मना कर दिया कि उसे किसी नौकर की जरुरत नहीं .....हालाँकि अनिरुद्ध पर तरुण को जरा सा भी शक नहीं हुआ था....अनिरुद्ध ने इस बात का फायदा उठाया और झपट पड़ा तरुण के पैरों पर ...मनहर ने मौके की नज़ाकत समझते हुए तरूण से कहा ," साहब्! देखो बेचारा कैसे गिड़गिड़ा रहा है ..रख लो न इसे काम पे..विश्वास का आदमी है " ......तरुण ने आखिरकार मनहर की बात मान ली और अंजाने में अनिरुद्ध को नौकर बना लिया...........

इतिहास पुन: खुद को दोहराने वाला था...........अनिरुद्ध ने धीरे- धीरे तरुण और आकाश के गलत कामों के खिलाफ सबूत इकट्ठे करने शुरु किये.... इतने सालों से तरुण के काले कारनामों का विरोध करने की किसी की औकात नहीं थी.....इसलिये तरुण खंडेलवाल बेफिक्री से खुलेआम ड्रग्स , लड़्कियों की दलाली जैसे घिनौनें कामों को अपने घर पर ही अंजाम देता था ..जिसमें आकाश और पल्लवी भी शामिल थे ...इसके लिये घर में ही एक अलग कमरे का इंतेजाम था........अनिरुद्ध चूंकि एक पढ़ा-लिखा युवक था... उसे सबूत इकट्ठा करने के लिये ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी .....एक दिन उचित मौका देख अनिरुद्ध ने आकाश और तरुण के लैपटॉप से उनका सारा डेटा एक पेनड्राइव में सेव कर  लिया ....चूकिं आकाश , तरुण और पल्लवी  अश्लील फिल्म के गंदे काम में लिप्त थे ..इसी वजह से सबूत मिलने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई.....फिर क्या था उचित मौका देख अनिरुद्ध ने दुनिया भर की मीडिया को बुला लिया ....... मीडिया ने तरुण , आकाश और पल्लवी को काले कारनामों में लिप्त रंगे हाथों पकड़ लिया............. और तब अनिरुद्ध ने देश के तमाम न्यूज़ चेनल्स के सामने अपना नकली हुलिया उतार फेका...... और लोगो को अपना परिचय दिया.....

मीडिया वालों के पूछने पर कि आपके बाप  ने तो आपको मृ्त घोषित किया था......आप  तो पागल हो गये थे....ऐसे तमाम सवालों के जवाब में अनिरुद्ध ने कहा," जी नहीं! मैं पागल नहीं हूँ ...बल्कि मेरे अपने बाप तरुण खंडेलवाल ने मेरा इस्तेमाल किया ...ये पहले से ही इन काले कामों में लिप्त थे.... और जब मुझे  इसके बारे में पता चला तो मैंने इनका विरोध किया ...बदले में इन्होंने , आकाश और पल्लवी ने मुझे मार डालने की कोशिशें की, मेरा अपहरण किया और देखिये मेरी क्या  हालत कर डाली ....इतने समय से मैं इनकी कैद में था नैनिताल में ...किसी तरह बचते छिपाते यहाँ आया ...तो पता चला कि  इन्होंने मुझे मृ्त घोषित कर दिया था............ असल में  मैंने इनका विरोध किया जिसकी सजा इन्होंने मुझे दी ...पर गलत काम गलत है और हर गलत काम करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी ही चाहिये फिर चाहे वो मेरा बाप , भाई ही क्यों ना हों "..... अनिरुद्ध के ये कहते ही हर कोई तालियों से अनिरुद्ध का हौसला बढ़ाने लगे  ..... कुछ मीडिया वालों ने कहा कि ,"ये हैं असली हीरो"......अखिरकार जनता को  उनका हीरो दोबारा मिल गया........अनिरुद्ध ने सब कुछ खोने के बाद भी एक झटके में खुद के विश्वास के दम पर वो सब वापस पा लिया जो उसका अपना था..... और तरुण, आकाश व  पल्लवी को समझ ही नहीं आ रहा था कि कैसे अचानक देखते-ही-देखते एक बार फिर उनकी ज़िंदगी आ गई अर्श से फर्श पर................




                              - स्वप्निल शुक्ल

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10 comments:

  1. प्राची सक्सेना4 December 2012 at 04:35

    स्वप्निल जी , आपको बधाई.....कहानी बेहद रोमांचक है..... इसका उपन्यास के रुप में रुपांतरण अत्यंत रोचक होगा...... कृ्पा कर आगे बढ़ें ...मुझे पूरी आशा है कि पाठक गण इस उपन्यास को पसंद करेंगे..... एक बार पुन: बधाई व शुभ्कामनायें.
    -प्राची सक्सेना, देहरादून.

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  2. awesome story.....lots of suspense....lots of twist & turns.......mind blowing story....go ahead swapnil .
    - vikas jha

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  3. i don't like this story because its really emotionallllllllll.....u know ! my eyes are filled with tears....that's why i never wanaa read its next parts.....i don't know whether u gonna take this comment as appreciation or critics....but sorry dear ....you r the one who made me cry for 4 hrs..believe me!! :(

    -a regular reader of your blogs.

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  4. it includes a lot of twists & turns .........it involves a continuous mind exercise & the reader will only think how the story will revealed .....how the protagonist will save his life ....amazingly brilliant work swapnil ji...best of luck
    - mohd. Wasim .

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  5. आस्था.4 December 2012 at 04:51

    बहुत अच्छी शुरुआत ..... आगे के भाग पर भी यदि उचित समझें तो प्रकाश डालें..... आशा है कि यह उपन्यास सफल रहेगी.
    - आस्था.

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  6. manisha kushwaha5 December 2012 at 04:42

    wow..... awesome story ...i will share it with my friends & let you know their responses too.... best of luck swapnil !
    - manisha kushwaha

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  7. very touching story...... thanks for sharing .

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  8. अनीता बाजपई.5 December 2012 at 04:45

    उमदा कहानी ....... प्रारंभिक भाग ही इतना अधिक रोचक है......या ये कहूँ कि आगाज़ ही इतना उमदा है तो अंजाम कितना बेहतरीन होगा ये शायद मेरी कल्पना के परे है.... पुस्तक भंडारों में ' अर्श से फर्श के सफर' क इतंजार रहेगा.
    - अनीता बाजपई.


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  9. कहानी बेहद रोमांचक लगी हमे तो .........स्वप्निल जी
    ......ब्लॉग पर आकर हौसला अफजाई के लिए शुक्रिया

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