Sunday, 2 September 2012

स्वप्निल




स्वप्निल :

प्रिय ब्लॉग दोस्तों, यह कविता मैंने कक्षा -6 वीं में लिखी थी... अभी हाल ही में एक पुरानी डायरी में इसे देखा .....सोचा क्यों ना इसे अपने चिट्ठे पर प्रकाशित करुँ.... इस कविता पर आप सबकी बहुमूल्य टिप्पणियों की अपेक्षा के साथ , प्रस्तुत है मेरी द्वारा रचित एक और कविता :



सूर्य तो प्रकाश का स्रोत होता है ,
इस सूर्य से ही तो हमें प्रकाश प्राप्त होता है,
फिर अंधकार चाहे जितना भी जटिल क्यों न हो ,
प्रकाश तो फिर प्रकाश होता है ,
आखिर एक छोटे से दिये से भी तो प्रकाश प्राप्त होता है .

मनुष्यों को जीवन प्राप्त होता है ,
पशु- पक्षियों को भी जीवन प्राप्त होता है ,
फिर जीवन चाहे जितना भी कष्टदायी क्यों न हो ,
जीवन तो जीवन होता है ,
आखिर जीवन हौसले से जीना तो सभी को होता है .

सफल होकर आकश में उड़ना तो अच्छा लगता है,
सफल होकर पानी में तैरना भी तो अच्छा होता है ,
फिर सफलता चाहे जितनी भी ऊँची क्यों न हो ,
आखिर सफल होकर जमीं पर चलना भी तो अच्छा होता है.

मोहब्बत से मोहब्बत मिलती  है,
नफरत से नफरत प्राप्त मिलती है ,
फिर नफरत चाहे जैसी भी हो ,
मोहब्बत तो मोहब्बत ही होती है ,
आखिर नफरत को मोहब्बत में बदला भी तो जा सकता है .




                                                    - स्वप्निल शुक्ल


copyright©2012Swapnil Shukla.All rights reserved 
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3 comments:

  1. bahut khoob kya baat hai........ bachpan se hi talented ho.

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  2. thanks utkarsh ....kaafi samay baad aapko dekh acchaa lagaa ....keep visiting & writing your precious comments .

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  3. सराहनीय प्रस्तुति .

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