Wednesday, 1 August 2012

दुशासनों का कैसे हो अब वध ?

 दुशासनों का कैसे हो अब वध ?

भी हाल ही में  गुवाहाटी में 11वीं कक्षा में पढ़ने वाली मासूम बच्ची के साथ बेहद शर्मसार करने वाला हादसा न्यूज़ चैनलों के माध्यम से सामने आया. उस वीडियो को देखते वक्त शायद ही कोई ऐसा हो जिसकी  आँखों में आँसू न भर जाएं ?? यह सब देख समस्त  देशवासियों का दिल व शरीर  क्रोध की अग्नि से जल उठा. हमारे देश में एक मासूम के साथ हो रही  बद्सलूखी को देख हम सभी सिहर उठे. मेरे मन में तो बस यही ख्याल आया कि काश ! ये एक भयानक स्वप्न हो जो आँख खुलते ही खत्म हो जाए परंतु दुर्भाग्यवश यह यथार्थ है , कोई दुस्वप्न नहीं ...जो कब खत्म होगा इसका शायद कोई जवाब न दे पाए क्योंकि सच्चाई तो यह है कि लोग अपनी आँखे खोलना ही नहीं चाहते . यदि लोगों की आँखे खुलें और वे थोड़ा सा हौसला दिखाएं .. अपने अंदर की शक्ति की जरा सी ही सही पर पह्चान तो करें, तो ऐसे हादसों की वीडियो देख मेरे जैसी लेखिकाओं / ब्लॉगर्स को लिखने के लिये कुछ सौंदर्यपरक विषयों पर दृ्ष्टि डालने का मौका भी मिले पर लिखने के लिये जब कुछ सोचती हूँ तो यकीन मानिये ऐसे घिनौने मुद्दों के अलावा कुछ ज़ेहन में आता ही नहीं. और देखिये गुवाहाटी में हुआ ये हादसा बेहद निंदनीय है कि वीडियो में रिकार्ड वे नामर्द उस बच्ची की अस्मिता के साथ खिलवाड़ कर हँस रहे थे, दाँत दिखा रहे थे. पुलिस इतने दिन बीत जाने के बावजूद सिर्फ चंद लोगों को ही गिरफ्तार कर पाई. बाकी मीडिया की भूमिका इस वारदात पर सराहनीय है कि वे इस मुद्दे को पूरी गंभीरता से ले रहे हैं. राष्ट्रीय महिला आयोग के साथ न जाने कितनी ही महिला कल्याण संस्थायें इस मुद्दे पर अपनी टिप्प्णी देते दिखाई दे रहीं हैं. ऐसे में सवाल यही उठता है कि ऐसे ह@#$%&* , कुत्सित, विकृ्त मानसिकता के लोगों को सजा क्या मिलनी चाहिये ?? कहाँ है इन सबका अंत ????

एक मासूम बच्ची चीख रही है, चिल्ला रही है और उन हैवानों, कमीनों का समूह जो उस मासूम को बराबर नोच रहा है , घसीट रहा है और हँस रहा है ........... ये मानव हैं? क्या असल में ऐसे लोगों को इंसान कहना उचित होगा??

स्त्री सशक्तिकरण व रक्षा के संदर्भ में घिसी-पिटी बातों -विवादों से हमारा लगभग हर रोज साक्षात्कार होता है  और इन बात विवाद , बहसों का अंत सिर्फ इस वाक्य के साथ हो जाता है कि स्त्री रक्षा व कल्याण के लिये सख्त कानून बनें, नियम बनें. ... राजनेताओं को इस संदर्भ में ध्यान देना होगा , अपनी कुर्सी पर ध्यान देने से परे हटकर .

मेरे अनुसार ऐसे लोग जिनके हाथों में शासन की सुव्यवस्था व जनता की रक्षा की ज़िम्मेदारी है , वे अपनी कुर्सी के अलावा किसी भी मुद्दे पर क्या कभी ध्यान देते हैं ???? ये राजनेता क्या सोचते हैं कि  अपनी ज़िम्मेदारियों से यूँ भागते- भागते जब वे अपने कार्यक्षेत्र को ही नहीं संभाल सकते तो क्या उनकी कुर्सी ज्यादा दिनों तक उनसे संभल सकती है ??????
रही बात नियमों की .. नियम जब बनेंगे , तब बनेंगे . अभी प्रश्न यह उठता है कि आखिर कब तक सख्त नियमों के झूठे आश्वासनों व उम्मीद के साथ हम लोग ऐसे हादसों से रुबरु होते रहेंगे ?

इसका उत्तर साफ है - जब तक सख्त नियम नहीं बनते तब तक हमें अपने नियम स्वयं ही बनाने होंगे. मेरे अनुसार उन सारे या ऐसी घिनौनी हरकत करने वाले मा@#$% , भो@#वालों , बे#$ के लौ# , रासकल्स , कापुरुषों को वस्त्रहीन करके  , गधे पे बिठा के , पूरे मुँह व बदन पर कालिक पोतकर , जूतों का हार पहनाकर पूरे गुवाहाटी के चक्कर कटवाने चाहिये और हाँ, यदि गधा ना मिले तो पैदल ही दौड़ा देना चाहिये. सिर्फ  गुवाहाटी ही नहीं अपितु पुरे देश के देशवासियों को सरेआम ऐसे कापुरुषों पर चमरौधों की बरसात करनी चाहिये , वो भी तब तक जब तक घुट-घुट कर, तड़प- तड़प कर ऐसे नामर्दों , ऐसे दुशासनों का जड़ मूल समेत अंत ना हो जाए और भविष्य में कोई दुशासन कभी न पैदा हो पाए. आखिर हमारा इतिहास भी तो इसी का साक्षी है , जब 'द्रौपदी' ने अपने अपमान का बदला दुशासन के रक्त द्वारा अपने केश धोकर लिया. आज भी स्त्री के सम्मान , अस्मिता की रक्षा  के लिये जरुरत है 'महाभारत' की . हम सबको अब द्रौपदी बन जाना है और अपने अपमान का बदला ऐसे कापुरुषों के रक्तरंजित सर्वनाश द्वारा ही संभव है .

और मैं , यह साफ कर दूँ कि अपने लेखन द्वारा किसी भी व्यक्ति विशेष को या उनकी भावनाओं को भड़काना नहीं चाहती .परंतु ये मेरी हुंकार है . मेरी आत्मा विलाप कर रही है क्योंकि जो गुवाहाटी की उस मासूम बच्ची के साथ हादसा हुआ , इससे बुरा अब और कुछ हो ही नहीं सकता .


                                            -स्वप्निल शुक्ल

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1 comment:

  1. स्वप्निल आपको बहुत बहुत बधाई और धन्यवाद .....इस लेख को प्रकाशित करने के लिये :)

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