Wednesday, 15 August 2012

घुटन - 06 { पूर्ण विराम }



घुटन - 06  { पूर्ण विराम }

जीब जंग है ये जिसमें रिश्ते ही उड़ा रहे हैं रिश्तों का मज़ाक ,
अपने ही कर रहे हैं अपनों पर वार
जीतना बड़ा है मुश्किल ये महासंग्राम , आखिर कैसे भुला दें
अपने अपनों को ही आज ?
लेकिन जब पलटते हैं इतिहास ,
तो सोचते हैं कि आखिर इन अपनों में कहाँ था ,
हमारे लिये वो अपनों का प्यार , इकरार , ममता और बलिदान.
मांग थी तो थी भी क्या कि बस लेनी है हमारी ही जान
ख्वाब थे उनके कि मारेंगे हमें तड़पा -तड़पा के, घुटा - घुटा के,
देंगे हमें जिल्ल्त , घुटन , तड़प व दर्द की हर एक सांस .
सड़क पे भीख मंगवाएंगे ,
ज़िल्लत की ज़िंदगी से हमारा हर पल हर दम साक्षात्कार करायेंगे,
कर देंगे हमारे अस्तित्व का ही विनाश , तभी तो बन पायेंगे वो भगवान.
तो आखिर कब तक सहें, कब तक घुटे ?
आखिर लड़ना तो होगा हमें भी ये संग्राम ,
जो है अपनों का अपनों के खिलाफ ,
उन अपनों के खिलाफ जिन्होंने उड़ाया है,
बनाया है हर एक रिश्ते का मज़ाक,
तो शीत युद्ध होगा हमारा हथियार
लड़ेंगे हम बिन हथियार पर फिर भी करेंगे दुश्मनों पर वार,
बनेगी हमारी खामोशी अब हमारी अवाज़ ,
देखेगी दुनिया खामोशी का विनाश ,
चूंकि हम घुटे .....हम तड़पे .... हम चीखे - चिल्लाए
कि आखिर कोई हमें हमारा गुनाह तो बता दे ,
पर दिल को यूं किश्तों में दर्द तो ना दे ,
पर तब तो छाया था दुश्मनी का आलम इस कदर ,
कि ताकत का नशा था, घमंड की मदहोशी थी ,
बेशर्मी की बुनियाद , बद्सलूखियों की मिसालें थीं,
तो क्या बताते जब दुश्मनी की कोई वजह ही न थी.
था तो बस शौक एक तरफा दुश्मनी निभाने का ,
मिटाना थ वजूद हमारा यही तो उनका मकसद था.
पर खुदा जिसके साथ हो ,
जिसका अस्तित्व ही खुद खुदा हो ,
कौन मिटा पाया है उसे?
हम तो कल भी थे, आज भी हैं और कल भी होंगे ,
चूंकि अब हर सांस की यही है मांग चाहिये उन्हें :
पूर्णविराम.                                                         

                         - स्वप्निल शुक्ल

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