Tuesday, 14 August 2012

घुटन - 05 { कश्मकश }




घुटन - 05 { कश्मकश }

ये अजीब कश्मकश है ज़िंदगी की ,
जिंदगी की शुरुआत हुई कुछ धुंधली सी.
जब धुंध में झांक कर देखा हमने तो पाया,
दुश्मनी का कोहरा हर ओर,
दुश्मनी की आड़ में अपने बन के बेगाने ,
बिछाये थे षड़यंत्र , कुचक्र का जाल हर ओर .
अपने ही जब थे बेगाने तो बेगानों से क्या दिल लगाते .
बस दुश्मनी की आग कुछ इस कदर लोगों पर सवार हुई ,
कि मासूमियत कब इस दुश्मनी का शिकार हुई , इसका हमें अहसास नहीं.
काश अहसास इसका हो जाता हमें भी जल्द से जल्द
कि नहीं रखता कोई मोल अपनों के अफसानों का
इन बेगानों से क्या कहे , इन्हें तो चढ़ा है खुमार दुश्मनी निभाने का,
खुमार ये ऐसा चढ़ा है कि उतरेगा ये नहीं समझाने से ,
ये नशा तभी उतरेगा अंजाम इन सबका बिखाने से .
दुश्मनी एक तरफा नहीं निभती कभी,
पर इन कमजर्फों को क्या कहें
जो इस बात को समझे ही नहीं कभी.
लो नादान उम्र से ही पर उतर लिए दुश्मनी की आग में हम भी,
बना लिया दुश्मनी को अपना मुकद्दर
और अब देखेगी दुनिया आखिर क्या होता है

असलियत में दुश्मनी का खौफनाक मंजर.

                     - स्वप्निल शुक्ल


copyright©2012Swapnil Shukla.All rights reserved
No part of this publication may be reproduced , stored in a  retrieval system or transmitted , in any form or by any means, electronic, mechanical, photocopying, recording or otherwise, without the prior permission of the copyright owner. 


No comments:

Post a Comment