Saturday, 11 August 2012

घुटन - 03



घुटन - 03

रकर भी सुकून न होगा,
एक अधूरापन दिल-ए-ज़िगर में हरदम हरपल होगा.
अधूरी रह गई ज़िंदगी , अधूरे रह गये सपने.
अधूरे रह गये खुदा से किये हर एक वायदे,
अधूरे रह गये वो अफसाने,
अधूरी रह गई एक कहानी , जिसे पूरी कर खुदा को थी दिखानी .
ये अधूरापन हमें मरकर भी सुकून न देगा,
हरदम हरपल ये एक ज़ख्म नासूर बन
कर उमड़ता रहेगा.
तो गर मर भी गए हम तो आखिर मरकर भी क्या होगा?
जब मरकर भी हमें कभी चैन व सुकून न होगा.



                                        - स्वप्निल शुक्ल

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