Saturday, 4 August 2012

घुटन - 01



घुटन - 01

भी वक़्त का ज़ख्म यूँ मिला हमें,
कि घुटन की चुभन हर वक़्त, हर पल , कुछ इस कदर हुई हमें,
बन गई रुह भी एक आवारा लाश की तरह,
जो घुटती तो है घुटन में, गर जिस्म छोड़ने को राज़ी नहीं.
मकबरे रुपी जिस्म ये मेरा , भी दूर नहीं होता इस आवारा रुह से 
जाँ मेरी निकलने को होती है आतुर पर पीछे है एक अधूरापन .
ओह ! ये घुटन मेरी इस कदर हूक उठाती है,
साँसे मेरी थम कर रह जाती हैं पर काश ये घुटन की हूक ,
एक बार बाहर आ जाए मेरे दिल से , 
तो उस हूक के साथ जिस्मानी मकबरे के मोह में कैद , 
वो आवारा रुह भी बाहर आए मेरे जिस्म से .
पर ये घुटन सिर्फ और सिर्फ घुटाती है इतना ,
कि हम तरसे हैं , पानी कि एक-एक बूंद के लिये 
उस वक़्त गर कुछ एहसास होता है, 
तो बस होता है घुटन की घुटन का ,
घुटन की चुभन का.
जो पानी की एक बूंद से ला तो देती है जिस्मानी मकबरे में
वापस जां,
पर वापस जां के जिस्म में आ जाने से , मिला तो आखिर मिला भी क्या?
मिली तो हमें मिली बस घुटन की घुटन .



                              - स्वप्निल शुक्ल

copyright©2012Swapnil Shukla.All rights reserved
No part of this publication may be reproduced , stored in a  retrieval system or transmitted , in any form or by any means, electronic, mechanical, photocopying, recording or otherwise, without the prior permission of the copyright owner.  


2 comments:

  1. a very nice poetry dear ...... such a heart touching poetry ...

    ReplyDelete
  2. waiting to see its next parts .best wishes

    ReplyDelete